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बनगांव से आयी सुचारिता ने कहा कि मैं पेशे से मनरेगा मजदूर हंू लेकिन लंबे समय से न तो मनरेगा का काम मिल रहा है और न ही भुगतान मिल रहा है। ऐसे में पेट पालने के लिए जो विकल्प नजर आया उसे मैंने चुना।
शंकर यादव
कोलकाता। मनरेगा मजदूरों की बदहाली को लेकर तृणमूल महासचिव अभिषेक बनर्जी से लेकर तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी तक सडक़ पर उतरकर आंदोलन कर रहे हैं। मनरेगा बकाया को पाने के लिए कोलकाता से दिल्ली तक विरोध प्रदर्शन किया गया लेकिन अभी तक कोई निष्कर्ष नहीं निकला। स्थिति यह है कि अब मनरेगा मजदूरों को अपना पेट पालने के लिए परिवार से तो दूर रहना ही पड़ रहा है साथ ही इस कड़ाके की ठंड में सडक़ पर रात भी गुजारनी पड़ रही है। एक तरफ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी गुरुवार को मनरेगा के बकाये को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ बैठक करनेवाली हैं तो दूसरी तरफ मनरेगा मजदूर बदहाली के आंसू रो रहे हैं। दिन हो या रात कोलकाता स्थित रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के सामने सैंकड़ों महिलाओं का झंूड इन दिनों नजर आ रहा है। कोई बागनान की रहनेवाली हैं तो कोई बनगांव की, कोई नंदीग्राम से आया है तो कोई झाडग़्राम से। आरबीआई के बाहररात गुजारने के बाद उन्हें उनके हाथ डेढ़ से दो हजार रुपये रोजाना लग रहे हैं। न कोई जोखिम, न नुकसान का डर। बस आरबीआई के बाहर रात भर कतार में खड़ा होना है और सुबह 10 बजे बैंक खुलते ही दो-दो हजार रुपये के गुलाबी नोट आधार कार्ड के साथ जमा करने पर 500 रुपये की हरियाली नोट उन्हें मिलते हैं। इन रुपयों को उनके मालिक तक पहुंचाने पर उन्हें प्रति 2 हजार के नोट पर 300 से 500 रुपये मिल रहे हैं। यानी दस नोट के बदले 3 से 5 हजार रुपये। लेकिन इन रुपयों को कमाने के लिए उन्हें सर्दी की मार भी झेलनी पड़ती है और अपनी अस्मिता भी दाव पर लगानी पड़ती है क्योंकि सर्दी भरी रात में शौचालय उन्हें सडक़ पर ही करना पड़ता है।
बनगांव से आयी सुचारिता ने कहा कि मैं पेशे से मनरेगा मजदूर हंू लेकिन लंबे समय से न तो मनरेगा का काम मिल रहा है और न ही भुगतान मिल रहा है। ऐसे में पेट पालने के लिए जो विकल्प नजर आया उसे मैंने चुना। सुचारिता ने कहा कि सप्ताह में पांच दिन बैंक खुलता है और रोजाना नोट बदलवाकर आय करती हंू और फिर शुक्रवार को अपने घर बनगांव लौट जाती हंू। दो दिनों के बाद रविवार की रात वापस आरबीआई के सामने लाईन में लग जाती हंू।
लाईन में खड़ी एक वृद्धा ने बताया कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है क्योंकि फसल को तो नुकसान हुआ ही है साथ साथ बेटे को मनरेगा का पैसा भी नहीं मिल रहा है ऐसे में परिवार का पेट पालने के लिए जो काम समझ में आया, कर रही हंू। मनरेगा मजदूरों के साथ साथ बैंक के बाहर फटे पुराने नोट बदलने वाले लोग भी जमकर चांदी काट रहे हैं। 2000 के नोट कितने भी लाख के क्यों न हो, मोटा कमिश्न देने पर वो इसे बदल दे रहे हैं।
ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि मनरेगा मजदूरों की मजबूरी का फायदा उठाकर काले धन के सौदागर अपने रुपयों को सफेद कर रहे हैं। साथ ही सवाल आरबीआई की नीतियों पर भी उठ रहा है कि एक ही व्यक्ति अपने आधार कार्ड से रोजाना 20 हजार रुपये बदलवा रहा है और वो व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि मनरेगा मजदूर हैं। ऐसे में दो हजार रुपये के नोट से काले धन तक पहुंचने की सरकार की इस कवायद का खुलेआम माखौल उड़ रहा है।